गहरे पानी का संकट

By People's Archive of Rural India on 06 Aug 2017 | read
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No other country can claim that it has such a deep connection with the rest of the country, as much as the small town of Tamilnadu. The machines here have dug deep well in most states of India (and also in many African countries). Thiruchengode is the Borvel Capital of the country and thousands of machines and operators go to the depth of 1,400 feet on any day, in most months of the year. In states like Maharashtra, monsoon has stopped their work, where in recent years they have done a lot of business. But, some parts of the country are also where it is still busy digging for water.

Water crisis in Maharashtra - which is only highlighted in summer - In the first three months of this year (2013), thousands of borewells were dug only in Marathwada region. The borewell rig loaded on the truck was present everywhere in the fields. And the borewell itself in rural districts, if not water, was the biggest source of debt. All the rigs we saw while driving on the roads were all brought from Tamil Nadu. (Some were also from Andhra Pradesh.) A senior geologist from Maharashtra then told the Dahindu newspaper, "Most of them are known to bring only one town. And that town was Thiruchengode, which is in Namakkal district of Tamil Nadu.

Shri Vayapuri of Sri Balamurugan Borwells told me in Tiruchengode, "I stayed in a village near Nanded in Maharashtra for four months this year." He is a dynamic, diligent rig operator. In these four months, this single operator dug about 500 wells in Maharashtra, most of the water deficient in Marathwada, Marathwada. He explains, "You can dig up to 1,300 feet in a day. If the soil is loose, digging can easily be done. This means that if the depth of the well is within 300 feet, then you can dig four wells in one day. But, if the soil was tough, then you can not dig more than 1,000 feet in a day. "


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Every year thousands of rocks reach the dried states of India and dig more than 1,000 feet deep to remove the already groundwater for irrigation


रिग लदे हुए हर ट्रक के साथ एक दूसरी बड़ी गाड़ी है, जो अपने साथ उपकरणों और आदमियों को लेकर चलती है। पूरी टीम 20 लोगों तक की हो सकती है। एक प्रबंधक, दो ड्रिलर, दो सहायक, दो ड्राइवर, एक खाना पकाने वाला और 12 मजदूर। इन कामगारों ने पूरे भारत को तिरुचेनगोडे तक पहुंचाया है। तमिलनाडु के रिग ऑपरेटरों के एजेंट और दलाल हर प्रांत में हैं। कामगार अधिकतर बिहार, उड़ीसा, झारखंड और छत्तीसगढ़ के हैं। कुछ ही तमिलनाडु के हैं। उनकी दैनिक मजदूरी 200 रुपये और तीन समय का खाना है, जो साल में कई महीनों तक चल सकता है।

यह कठिन काम है, और रेट अलग-अलग हैं, जो इस बात पर निर्भर है कि काम कितना कठिन है। आंध्र के कुछ कठोर भूतल वाले क्षेत्रों में आप एक घंटे में 80 फुट से अधिक खुदाई नहीं कर सकते। वहां खुदाई का दर 75 रुपये प्रति फुट है। यानी एक दिन में 1,000 फुट की खुदाई की कीमत हुई 75,000 रुपये। जहां मिट्टी नरम हो, वहां वैयापुरी के अनुसार, एक घंटे में आप 120 फुट तक खुदाई कर सकते हैं, इसलिए वहां खुदाई की कीमत भी घटकर 56 रुपये प्रति फुट हो जाती है। लेकिन, तब भी आप 1,300 फुट तक खुदाई कर सकते हैं, यानी लगभग 73,000 रुपये प्रतिदिन। अगर आप 200 दिनों की नौकरी पर हैं (यह अवधि अधिकतर इससे ज्यादा होती है), तब भी कुल लागत 1.5 करोड़ रूपये की आयेगी।

तिरुचेनगोडे नगर और तालुका में कुल कितने रिग हैं? पांच हजार से अधिक नहीं, टीटी परनथामन, ड्रिलिंग की एक बड़ी कंपनी, पीआरडी के प्रबंध निदेशक बताते हैं। तिरुचेनगोडे लॉरी ओनर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष और खुद एक रिग स्वामी, एनपी वेलू का अनुमान है कि यह संख्या लगभग 7,000 है। अन्य ऑपरेटरों का दावा है कि यह संख्या 20,000 तक हो सकती है। विभिन्न स्तरों पर ये तीनों संख्या सही हो सकती है। एक बड़े निर्माता के अनुसार, ''यहां बड़ी संख्या में रिग और उनके मालिक हैं। लेकिन कई रिग दूसरे राज्यों में पंजीकृत हैं, शायद टैक्स बचाने के लिए।''

इस बीच, ये ऑपरेटर ग्रामीण राजस्थान जैसे दूरदराज क्षेत्रों से लौट रहे हैं। एक ने तो जम्मू तक में कुएं की खुदाई की है। एक साल में दो या तीन महीने का अंतराल होता है, जब इन रिग्स की सर्विसिंग की जाती है। वह भी अधिकतर बरसात के दिनों में।

वेलू बताते हैं कि अलग-अलग राज्यों में कुओं की औसत गहराई अलग-अलग होती है। ''कर्नाटक में औसतन यह गहराई लगभग 1,400 फुट है। तमिलनाडु में भी बहुत कम नहीं है। इसकी शुरुआत 1970 के दशक में अकाल पड़ने की वजह से हुई।'' इस क्षेत्र में अवसर को भांपते हुए किसानों के कई समूह और कामगारों ने कुएं खोदने, उसके संसाधनों को इकट्ठा करने तथा कुछ रिग खरीदने शुरू कर दिए। (आज भी यहां एक तिहाई रिग के मालिक किसानों के यही समूह हैं।)

वेलू कहते हैं, ''उस समय, जिस गहराई में हमें पानी मिल जाता था, वह 100-200 फुट से अधिक नहीं होता था। अधिकतम 300 फुट। कुओं की गहराई में सबसे अधिक वृद्धि पिछले पांच वर्षों में हुई है।''

इस नगर के रिग ऑपरेटरों की कहानी दोहरी मुश्किल पैदा करने वाली है। ये तिरुचेनगोडे और आसपास के क्षेत्रों के लिए नौकरी और समृद्धि लेकर आए हैं। इनमें वे लोग भी शामिल हैं, जो कभी अशिक्षित कामगार थे, लेकिन 1970 के दशक के अंतिम दिनों में वे रिग खरीदने के लिए एकत्रित हुए और इस प्रकार गरीबी से बाहर निकल आए। (कोयम्बटूर, करूर तथा तिरुप्पुर सहित तमिलनाडु के इस पूरे क्षेत्र की कहानी काफी प्रभावशाली है, जहां बिल्कुल निचले स्तर से उठकर लोग बड़े व्यवसायिक बन गए।) रिग ऑपरेटर देश भर के किसानों की वास्तविक मांगों को भी पूरा करते हैं। ऐसी मांग जो निराशा से भरी हुई है।

लेकिन, इस प्रक्रिया ने भूजल की आपूर्ति को लेकर गंभीर समस्या पैदा कर दी है। पानी के इस संसाधन के हद से ज्यादा दुरुपयोग से देश भर में जल-स्तर तेजी से घटता जा रहा है। मराठवाड़ा के उस्मानाबाद के कलेक्टर ने बताया कि इस मार्च (2013) उनके जिला में जलस्तर (जहां पर रिग सक्रिय हैं) पिछले पांच साल के औसत से पांच मीटर नीचे था। अगर केवल तमिलनाडु के एक भाग के 10,000 रिग पूरे भारत में औसतन प्रतिदिन 1,000 फुट खुदाई कर रहे हैं, तो कुल खुदाई हो गई 10 मिलियन (एक करोड़) फुट। अगर एक साल के 200 दिनों का हिसाब लगाया जाए तो कुल खुदाई हो गई 2 अरब फुट। यह खुदाई तो बहुत ज्यादा है। अगर उनमें से ज्यादातर कुएं विफल भी हो जाते हैं, तब भी जमीन के नीचे से भारी मात्रा में पानी बाहर निकाला जा रहा है।

तिरुचेनगोडे के रिग ऑपरेटरों ने विकास का यह रास्ता देश के लिए नहीं चुना था और इसके लिए उन्हें दोषी नहीं ठहराया जा सकता। उन्होंने जमीन के नीचे मौजूद पानी को बेरोकटोक निकालने की विधि का आविष्कार नहीं किया। और भले ही वे बड़ी शक्ति हैं, लेकिन देश में और भी ऑपरेटर हैं। रिग के अन्य उपयोग भी होते हैं, लेकिन बड़ी मांग कुएं खोदने की है। और अगर यही सिलसिला जारी रहा, तो यह विनाशकारी साबित हो सकता है। (भारत में भूजल का दो-तिहाई सिंचाई के लिए है, जबकि चार-पांचवां पेयजल है।) इस प्रक्रिया का आवश्यक सामाजिक नियंत्रण पानी की वर्तमान स्थिति में संभव नहीं है।

खुद आपके पड़ोस में इतनी अधिक मशीनों काम पर क्यों लगी हुई हैं? मैंने जब यह सवाल तिरुचेनगोडे के एक अनुभवी से किया, तो उनका जवाब था, ''यहां अब बहुत ज्यादा पानी नहीं बचा है। हम निकट के ईरोड कस्बे में 1,400 फुट की खुदाई कर रहे हैं।''

Yhleksrwprthamdhindumen 28 Julai , 20l3 Koprkashithua.

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